आलवार संत कौन थे और इनकी संख्या कितनी थी | Aalavaar Sant kaun the aur inakee sankhya kitanee thee
आलवार, मुख्यतः विष्णु भक्त थे। आलवार का शाब्दिक अर्थ मग्न होना होता है। माना जाता है दक्षिण में आलवारों की वाणी से रामभक्ति प्रस्फुटित हुई।
आलवार संत कौन थे
आलवार, ये मुख्यतः विष्णु भक्त थे। आलवार का शाब्दिक अर्थ मग्न होना होता है। ऐसा माना जाता है कि दक्षिण (तमिल) में आलवार संतों की वाणी से रामभक्ति प्रस्फुटित हुई।
आलवार संतों की संख्या बारह कही जाती है , इनके नाम हैं –
मोयंग आलवार
भूतंत आलवार
पै आलवार
तिरुमलि सई आलवार
नम्म आलवार
मधुर कवि आलवार
कुलशेखर आलवार
पेरिय आलवार
आण्डाल आलवार
तोडर डिप्पोड़ो आलवार
तिरुप्पान
तिरुमंगई
शठकोप अथवा नम्मालवार रामभक्ति के प्रथम कवि थे। इनकी रचना ‘तिरुवायमोलि’ में रामभक्ति का विशद वर्णन है। शठकोप रामानुजाचार्य से पाँच पीढ़ी पहले हुए हैं। शठकोप के गीतों का सर्वप्रथम संकलन नाथमुनि (दसवीं शताब्दी) ने किया।
शठकोप ने अपनी ‘सहस्रगीति’ में कहा है- दशरथस्य सुतं तं बिना अन्यशरणवान्नास्मि’।
शठकोप की प्रमुख रचनाएँ- तिरुवायमोलि, तिरुविरुतम, तिरुवर्ग शरियम, पेरियतिरुवन्दादि, सहस्रगीति।
शठकोप (काठकोप) ‘राम की पादुका’ के अवतार माने जाते हैं।
सातवें आलवार केरल के चेरवंशी राजा कुलशेखर राम के परम भक्त थे। किंवदंती है कि एक बार सीताहरण का प्रसंग सुनते ही भावावेश में इन्होंने तुरंत लंका पर आक्रमण करने का आदेश दे दिया था।
‘प्रेरु माल तिरुभोवि’ में कुलशेखर के रामभक्ति संबंधी गीत संकलित हैं।
आण्डाल एकमात्र महिला आलवार संत थीं। इन्हें दक्षिण की मीरा कहा जाता है।
यह भी पढ़े:-औपचारिक और अनौपचारिक पत्र में अंतर | Formal and Informal Letter
आलवार संत जाति-वर्ण का भेद नहीं मानते थे। कई आलवार संत निम्न जातियों से आते थे।
नालयिर दिव्य प्रबंधम् के रचियता
सर्वप्रथम श्री संप्रदाय के प्रथम आचार्य श्री रंगनाथ मुनि (824-924 ई.) ने आलवार संतों के पद्यों का संकलन नालयिर दिव्य प्रबंधम् शीर्षक से चार भागों में किया। ‘न्यायतत्त्व’ रंगनाथ मुनि की संस्कृत रचना है। श्री संप्रदाय में विष्णु व लक्ष्मी की उपासना मान्य है। रंगनाथ मुनि को रघुनाथाचार्य नाम से भी जाना जाता है।