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भारत में बढती बेरोजगारी

कारण ? कई है पर क्या और क्यों भारत में दिन पर दिन बेरोजगारी की दर बढ रही है।

क्या भारत में पब्लिक सैक्टर की कमी है?
भारत के पढे- लिखे युवाओं की गणन भी अनपढ और आयोग युवाओं में होती है।
क्या कारण है ? की यहाँ के युवा उच्च शिक्षा लेने के बाद भी अयोग सिद्ध हो जाते है ।

भारत जो संख्या के अनुसार अपनी शिक्षा का विस्तार करने में दुनिया में तीसरे स्थान पर है। पर  शिक्षा की  गुणवता की बात की जाये तो दुनिया में इसकी रैंकिग बहुत नीचे है। इसका कारण क्या है ।

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युवाओं का देश कहे जाने वाले भारत में हर साल 30 लाख युवा स्नातक व स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करते हैं। इसके बावजूद देश में बेरोजगारी दिन दूनी-रात चौगुनी बढ़ रही है।
हर साल बढ़ती शिक्षित बेरोजगारों की संख्या  भारतीय शिक्षा पद्धति को सवालों के घेरे में खड़ा करती है, उस भारतीय शिक्षा पद्धति को जिसने भारतीयों को धर्म और अध्यात्म तो खूब सिखाया पर उसी भारत के युवाओं को उनकी काबिलियत सिद्ध करने का हुनर नही सिखा पा रही है। गलती किसकी है?
हमारी तामझाम वाली उच्च शिक्षा हकीकत से कोसों दूर है, जबकि हम अपनी झूठी शान ही गाते फिर रहे हैं।
एक  संस्था ने नौकरी-पेशा करने वाले युवाओं का सर्वे कर उनकी मासिक व सालाना आय पर अपनी रिपोर्ट पेश की, इस रिपोर्ट में बताया गया कि देश का 58 फीसदी युवा बमुश्किल 65,000 रुपए सालाना कमा पाता है जबकि अधिकांश स्नातक छात्र देश के रोजगार कार्यक्रम मनरेगा की दर पर ही 6250 रुपए मासिक कमा लेते हैं, ऐसे में भारतीय शिक्षा से अच्छी मजदूरी कही जा सकती है, जो बिना लाखों खर्च किए पैसे तो देती है। भारत में एक ओर युवाओं को महाशक्ति माना गया लेकिन दूसरी ओर उसे बेरोजगारी और नाकामी की जंजीरों से जकड़ा दिया गया है।
बहरहाल, युवाओं के लिए भारतीय उच्च शिक्षा पूरी तरह नाकाम साबित हुई है। इसका एक महत्वपूर्ण कारण यह भी रहा कि देश में शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए कोई उपाय नहीं किए गया है और जो किया गया है उनकी जमीनी हकीकत कुछ और ही है। देश में 650 शैक्षणिक संस्थान व 33,000 से ज्यादा डिग्री देने वाले कॉलेज हैं लेकिन इनमें दशकों पुराने पाठ्यक्रमों का आज भी उपयोग किया जा रहा है।
शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए न तो यूजीसी ही ध्यान दे पा रही है और न ही विश्वविद्यालयों का प्रशासन इस पर कुछ करती है, नतीजा यह निकलता है, सारी की सारी घिसी-पिटी शिक्षा कॉलेजों के हवाले कर दी जाती है जिससे ये कॉलेज अपनी मनमानी कर पाठ्यक्रमों को निपटा देते हैं। यहां तक कि कॉलेज व विश्वविद्यालय छात्रों से मोटी-मोटी रकम लेकर उनकी फर्जी अंकसूची तक तैयार कर देते हैं इससे कॉलेज व विश्वविद्यालयों का नाम रोशन होता है लेकिन छात्र को पर्याप्त ज्ञान प्राप्त नहीं हो पाता।
दूसरी सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए आज तक हमारी राजनीति में शिक्षा पर बात नहीं होती बङे-बङे बिल पास होते है धर्म की बात होती है मंदिर बनवाने की बात भी होती है पर शिक्षा के लिये कोई ठोस कदम नही उठाया जाता है।
शिक्षा के क्षेत्र में राजनीति का महत्वपूर्ण योगदान रहता है लेकिन भारत की राजनीति को आरोप-प्रत्यारोप के अलावा किसी और  विषय पर विचार करने का समय ही नहीं है।
देश का एक इतना बड़ा तबका शिक्षित होते हुए भी आज बेरोजगार है, जो भारत की विकासशीलता में भी बाधा बना हुआ है। यहां की बेरोजगारी महामारी के रूप में अपनी जङे जमा रही है।
देश के शीर्ष अर्थशास्त्रियों ने भी माना है कि देश में बढ़ती गरीबी युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी का ही नतीजा है। यदि भारत को आर्थिक मजबूती देनी है तो हमारे शासन को धर्म जात की राजनीति छोङ कर रोजगार के अवसर बनाने और अधिक से अधिक युवाओं को रोजगार देने के बारे में सोचना होगा
कुल मिलाकर भारत में शिक्षा के स्तर को सुधारना होगा। झूठी शान में सिर्फ स्कूल, काॅलेज की संख्या बढाने से, सर्वशिक्षा का नारा दे देने से देश में शिक्षा का स्तर नही सुधर सकता जबतक शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए जमीनि स्तर पर कार्य नही किया जायेगा तब तक स्थिती बिगङती रहेगी।

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